*** नन्दगाँव के सखा कृष्ण को उलाहना देते हैं कि तुमने हमें बरसाना में बहुत पिटवाया । इसका बदला लेने के लिए कृष्ण बरसाना की गोपियों को नन्दगाँव बुलाते हैं । श्रीजी मन्दिर के प्रांगण में गायन, वादन एवं नृत्य की त्रिवेणी के साथ टेसू के फूलों से बने रंग की दिव्य सुगन्ध, रंग की बौछार, रंग-बिरंगे गुलाल के बादलों की छटा निराली होती है । यह सब लठमार होली में तब परिवर्तित हो जाता है, जब बरसाने की रंगीली गली में नन्दगाँव के गोप (श्रीकृष्ण के सखा) जिन्हें ‘हुरियारे’ कहते हैं, श्रीराधा जी की सखियों (गोस्वामी समाज की महिलायें जो सोलह श्रृंगार किये, गोटा लगे रंग-बिरंगे लहंगा पहने, घूँघट काढ़े, हाथ में प्रेमपगे लट्ठ लिए) से होली खेलती हैं । हुरियारे जब इनसे परिहास करते हैं तो हुरियारिनें लाठियों से उनका स्वागत करती हैं और उनको मजा चखाने के लिए बेताब रहती हैं । नन्दगाँव के हुरियारे मुढ़ासा (सिर पर बड़ी-सी पगड़ी) बांधे मजबूत ढालों से अपने सिर और शरीर की रक्षा करते हैं और घुटनों के बल फुदक-फुदककर बचाव करते हैं और हुरियारिनों से कहते हैं - "अई भाभी लग जावेंगी, नैक प्रेम ते दई दै ।"
*** यह कसमकश दो-तीन घण्टे चलती है । इस अलौकिक लीला के लिए हुरियारिनें सूरज से गुहार लगाती हैं -
"सूरज छिप मत जइयो आज, श्याम संग होरी खेलूंगी ।"
*** इस लठमार होली में हुरियारों व हुरियारिनों के बीच हंसी-ठिठोली व छींटाकशी होती है पर मर्यादा में रहकर । इस हुरदंग के मध्य रसिया भी गाये जाते हैं -
"फ़ाग खेलन बरसाने आये हैं, नटवर नन्द किशोर ,
घेर लई सब गली रंगीली , छाय रही छवि छटा छबीली ।
जिन ढप ढोल मृदंग बजाये हैं , बंशी की घनघोर ।
जुर मिलकें सब सखियाँ आईं , उमड़ घटा अम्बर में छाई,
जिन अबीर-गुलाल उड़ाये हैं , मारत भर-भर झोर ।
फ़ाग खेलन बरसाने आये हैं , नटवर नन्द किशोर
लै रहे चोट ग्वाल ढालन पै , केशर कीच मलै गालन पै,
जिन हरियल बांस मँगाये हैं , चलन लगै चहुँ ओर ।
भई अबीर की घोर अँधियरी , दीखत नाय कोऊ नर अरु नारी,
जिन राधे सैन चलाये हैं , पकरे माखन चोर ।
फ़ाग खेलन बरसाने आये हैं , नटवर नन्द किशोर
जो लाला घर जानौ चाहौं , तो होरी कौ फ़गुआ लाऔ,
जिन श्याम ने सखा बुलाये हैं , बाँटत भर भर झोर ।
राधे जू के हा-हा खाओ , सब सखियन के घर पहुँचाऔ,
जिन ‘घासीराम’ कथ गाये हैं , भयौ होरी कौ जोर ।
फ़ाग खेलन बरसाने आये हैं , नटवर नन्द किशोर
*** बरसाने की हुरियारिनों (स्रियों) को एक महीने पहले से विशेष खाना (घी, दूध, मेवा आदि) दिया जाता है, जिससे वह होली में अच्छी तरह से लाठी से हुरियारों पर प्रहार कर सकें । इस लठमार खेल में यदि किसी को चोट लग जाये और खून निकल आये तो केवल व्रजरज ही लगा देने से वह ठीक हो जाता है । लाड़ली लाल (राधाकृष्ण) की जयकार के साथ यह होली सम्पन्न होती है । होली के समय रंग-गुलाल डालने पर ऐसा प्रतीत होता है, मानो होली का यह मौसम सदा के लिए स्थिर हो गया हो । इसीलिए - "ऐसो रंग बरसे बरसाने में, जो रंग तीन लोक में नायँ । देवता भी इस आनन्द को प्राप्त करने के लिए तरसते हैं ।
तारी दे गारी गावहीं,
एकते एक बनी व्रजवनिता नाना रंग बरसावहीं ।
बाजत ताल मृदंग झांझ डफ मोहन वेणु बजावहीं,
चोवाचंदन अगर कुंकुमा सुरंग गुलाल उडावही ।
इत मोहन उत सखी समूह मिस खेलें हँसें हँसावहीं,
सूरदास प्रभु तुम बहुनायक फगुवा दे घर आवहीं ।
*** बरसाना से होली खेलकर जब ये युवक नन्दगाँव लौटते हैं तो बरसाना की गोपियाँ उनसे होली का फगुआ (नेग) मांगती हैं । वे उन्हें नन्दगाँव में होली खेलने का आमन्त्रण देते हैं । जिसके बाद बरसाना की गोपियाँ फगुआ मांगने नन्दगाँव जाती हैं तो युवक उन्हें अपनी भाभियों से छड़ी से पिटवाते हैं । इसका भाव यह है कि बरसाना में लाठियों से पिटाई पर नन्दगाँव के सखा कृष्ण को उलाहना देते हैं कि तुमने ही बरसाना में बहुत पिटवाया । इसका बदला लेने के लिए कृष्ण बरसाना की गोपियों को नंदगांव बुलाते हैं । बरसाना की होली के अगले दिन सायं काल ऐसी ही लठमार होली नन्दगाँव में नन्दचौंक पर होती है । यहाँ नन्दगाँव की स्त्रीयाँ होती हैं और बरसाने के पुरुष (पुरुष लोग सखी वेष में जाते हैं) । अगले दिन एकादशी से व्रज-वृन्दावन के सारे मन्दिरों और नगर-गाँवों में रंगीली होली आरम्भ हो जाती है । इस रंगीली होली में बाहर से डाला गया रंग-गुलाल तो थोड़े समय के पश्चात् छूट जाता है, किन्तु मन के भीतर पड़ चुकने वाला कृष्णप्रेम का रंग स्थायी हो जाता है ।
फागुन मास सुहायो रसिया , होरी खेलन आयो ।
अबीर गुलाल भरे फेंटन में , दौरि बदन लपटायो ।।
गारिन गावै भाव बतावै , बातन ही भरमायों ।
'कृष्णजीवन लछीराम' के प्रभु कों , नाना भांत नचायो ।।
जय जय श्री कृष्ण रंगीलों
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